नई दिल्ली 04 मई भारतीय ने ट्रेनों में सवार होने वाले यात्रियों से किराया वसूले जाने को लेकर जारी विवाद पर हैरानी व्यक्त की है और आशंका जतायी है कि इसके पीछे रेलवे के बदनाम करने की कोई राजनीतिक साजिश हो सकती है।

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के सूत्रों ने यहां बताया कि कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे लोगों को उनके गृहनगर तक पहुंचाने के लिए जब विशेष ट्रेनें चलाने का प्रस्ताव आया था तो राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच गाड़ियों के परिचालन एवं तौर तरीकों को लेकर गहन विचार मंथन हुआ था और यह तय हुआ था कि यात्रियों से कोई किराया नहीं वसूला जाएगा तथा उनके टिकट की राशि राज्य सरकारें वहन करेंगी।

सूत्रों ने इस संबंध में दिन भर जारी विवाद का सिलसिलेवार ढंग से स्पष्टीकरण दिया और कहा कि परिचालन की योजना के अनुसार रेलवे राज्य सरकार का अनुरोध प्राप्त होने के बाद उनके द्वारा बतायी गयी संख्या के बराबर टिकट अनारक्षित प्रणाली से छाप कर सारे टिकट एक साथ प्रारंभिक स्टेशन के जिला कलेक्टर कार्यालय में नोडल अधिकारी को सौंप देती है और यात्रियों को टिकट देना, उन्हें स्टेशन तक ला कर गाड़ी में बिठाने तक राज्य सरकार की ही जिम्मेदारी होती है। इसमें रेलवे के अधिकारी शामिल नहीं होते हैं। सभी जगह यही प्रक्रिया अपनायी जा रही है।

केन्द्र द्वारा 85 प्रतिशत और राज्यों द्वारा 15 प्रतिशत लागत वहन किये जाने के दावे के बारे में पूछे जाने पर सूत्रों ने बताया कि श्रमिक स्पेशल गाड़ियों में स्लीपर श्रेणी के कोच लगाये गये हैं जबकि राज्य सरकार से द्वितीय श्रेणी के अनारक्षित टिकट के हिसाब से किराया लिया जा रहा है। इसके अलावा 82 सीटों वाले स्लीपर कोच में 58 यात्रियों को समायोजित किया जा रहा है। गाड़ियों के मार्ग में यात्रियों को भोजन पानी भी रेलवे उपलब्ध करा रही है।

सैनिटाइजर, स्टेशनों पर विशिष्ट इंतजाम आदि सुलभ कराये जा रहे हैं। इस प्रकार से प्रति यात्री परिवहन लागत बहुत अधिक बढ़ गयी है। सूत्रों के अनुसार रेलवे पहले से ही किराये में लागत का 57 प्रतिशत ही लेती रही है और 43 प्रतिशत की भरपायी मालभाड़े एवं अन्य स्रोतों से करती रही है। अब इस परिस्थिति में लागत बढ़ कर 85 प्रतिशत तक आ गयी है जबकि राज्य सरकार के माध्यम से मिलने वाला द्वितीय श्रेणी टिकट का किराया लागत का लगभग 15 प्रतिशत ही है।

सूत्रों ने बताया कि टिकट पर 20 रुपये अतिरिक्त लिये जाने की बात है तो वह आरक्षण शुल्क के एवज में लिये जा रहे हैं क्योंकि अनारक्षित टिकट बुकिंग करते समय टिकट में आरक्षण शुल्क दर्ज करने का कोई कॉलम नहीं है। पर ये सारा पैसा मजदूरों को नहीं बल्कि राज्य सरकारों को देना होता है।

आप को बता दे की सूत्रों ने कहा कि यह विवाद महाराष्ट्र एवं केरल से चलने वाली गाड़ियों में ही यात्रियों से किराया वसूले जाने को लेकर पैदा हुआ है जिसका रेलवे से कोई लेना देना नहीं है। यात्रियों को टिकट सौंपने की जिम्मेदारी क्रमश: महाराष्ट्र सरकार और केरल सरकार की थी। सूत्रों के अनुसार रेलवे अब तक 45 गाड़ियों का परिचालन कर चुका है और कुछ को छोड़कर सभी राज्य सरकारों की ओर से रेलवे को टिकट की धनराशि प्राप्त हो चुकी है।

सूत्रों ने कहा कि यात्रियों से टिकट के मूल्य की वसूली किये जाने काे लेकर राज्य सरकारों की ओर से रेलवे को किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं मिली है। जिन राज्यों में ये विवाद पैदा हुआ है, उनमें केन्द्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के विरोधी दलों की सरकारें हैं। इससे संदेह हाेता है कि यह पूरा मामला रेलवे को बदनाम करने के लिए राजनीति प्रेरित हो सकता है।

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की योजना के बारे में चर्चा करने पर सूत्रों ने कहा कि विचार विमर्श में पता चला है कि रेलवे को श्रमिक स्पेशल ट्रेनें सैकड़ों की संख्या में अगले कई महीनों तक चलानी पड़ सकतीं हैं। अगर दस बीस ट्रेनों की बात होती तो रेलवे पूरी तरह से निशुल्क गाड़ियां चला देती। लेकिन सैकड़ों गाड़ियां मुफ्त चलाना संभव नहीं था।

इसीलिये राज्य सरकारों से वित्तीय जिम्मेदारी साझा करने को कहा गया तथा राज्य तैयार भी हो गये। सूत्रों ने कहा कि सरकार ने इस प्रकार की गाड़ियों के परिचालन के लिए एक स्थायी नीति बनायी है। क्योंकि भविष्य में क्या परिस्थिति होगी, यह अभी कहा नहीं जा सकता है।