कोरोना

डॉ. वेदप्रताप वैदिक —

कश्मीर के सवाल पर इधर कुछ अच्छी घटनाएं हो रही हैं। शेख अब्दुल्ला के बेटे और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ. फारुक अब्दुल्ला की नजरबंदी से रिहाई और जम्मू-कश्मीर की अपनी पार्टी के नेताओं की नरेंद्र मोदी और अमित शाह से हुई भेंटों से एक नए अध्याय का सूत्रपात हो रहा है। फारुक अब्दुल्ला के अलावा भी कई कश्मीरी नेताओं को अब तक रिहा किया गया है लेकिन उनकी रिहाई का खास महत्व है। तीन गिरफ्तार मुख्यमंत्रियों में वे सबसे वरिष्ठ हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में भारत के प्रति गहरी निष्ठा का प्रमाण दिया था। वे आतंकवादियों के प्रति भी काफी सख्त रहे थे। इसके अलावा अपने राज्य के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उनकी रिहाई को लेकर एक निराधार अफवाह यह भी चल रही है कि उनके दामाद और राजस्थान कांग्रेस के नेता सचिन पायलट को भाजपा तोड़ने पर आमादा है। राजस्थान की सरकार को वह म.प्र. की सरकार की तरह डांवाडोल करना चाहती है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि फारुक की रिहाई से अब सरकार का कश्मीरियों से सीधा संवाद हो सकेगा। फारुक ने रिहा होने के बाद कोई भी उत्तेजक बयान नहीं दिया है बल्कि उन्होंने सभी कश्मीरी नेताओं को रिहा करने की मांग की है ताकि कश्मीर के पूर्ण विलय पर सबके बीच सार्थक संवाद हो सके। यह संवाद जम्मू-कश्मीर की अपनी पार्टी ने शुरु भी कर दिया है। उसके प्रतिनिधि मंडल ने पहले प्रधानमंत्री और अब गृहमंत्री के साथ लंबी बातचीत की है। दोनों नेताओं ने उन्हें आश्वस्त किया है कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा शीघ्र ही बहाल किया जाएगा और अगले चार साल में जम्मू-कश्मीर को पिछले 70 साल में मिले 1300 करोड़ रु. से तीन गुने ज्यादा रुपए मिलेंगे। दोनों नेताओं ने यह कथन भी दोहराया कि जम्मू-कश्मीर में नौकरियों और जमीन पर बाहरी लोगों का कब्जा नहीं होने दिया जाएगा। पिछले सात माह से चले आ रहे प्रतिबंधों में अब काफी छूट शुरु हो गई है। मेरा खुद यह ख्याल है कि यदि ये प्रतिबंध नहीं लगाए जाते तो पता नहीं कश्मीर में कितनी हिंसा और प्रतिहिंसा होती। बेहतर हो कि डाॅ. फारुक अब्दुल्ला की तरह अन्य नेताओं को भी शीघ्र रिहा किया जाए और उनके साथ सार्थक संवाद शुरु किया जाए।