मुरादाबाद 26 मई (वार्ता) वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण जारी ने लोगों के जीने के अंदाज को बदल दिया है और इसमें भी अछूता नहीं है।

हिन्दू रीतरिवाज के अनुसार सभी मांगलिक कार्यक्रम सम्पन्न करने वाले नट सिर्फ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शव की चिता सजाने के बजाय दफना कर पूरी करते रहे हैं लेकिन लाकडाउन के बाद जब दुनिया के अधिकांश देश सोशल डिस्टेसिंग का पालन करते हुये भारतीय परंपरा के अनुसार अभिवादन करने लगे तो इस समुदाय को अपनी संस्कृति का पूर्णत: पालन करने की हूक उठी और उन्होने हिन्दू तौर तरीकों के अनुरूप शवों के दाह संस्कार का फैसला लिया है।

लाकडाउन ने नट समुदाय को समझाया जड़ का महत्व - शवों के दाह संस्कार का फैसला लिया 1

मुरादाबाद जिले से लगभग 15 किमी दूर छजलैट ब्लॉक के गांव सलावा में करीब 200 नट समुदाय के परिवार रहते हैं। धार्मिक महत्व के सभी तीज त्यौहारों, विवाह संस्कार से लेकर अन्य सभी रीति रिवाजों को हिंदू परंपराओं के अनुसार मानने वाले नट समुदाय में केवल शवों के दाह संस्कार की जगह दफनाने का रिवाज चला आ रहा था। ग्राम सभा द्वारा आवंटित डेढ़ बीघा जमीन पर बने नियत स्थान पर शवों को दफनाया जाता था।

समाज का यह वर्ग परंपरागत रूप से कलाबाजी और सर्कस के समानांतर, लोकगीतों के मनोरंजन के साथ भैंस-भैंसों पर गाने बजाने के यंत्रों को लादकर गांव गांव घूमने में यायावरी जीवन व्यतीत करता हैं। खासतौर से खेती कार्यों से ठलवार के बरसात के मौसम में यहां-वहां घूम-फिरकर तमाशा दिखाने के बाद ,फिर वापस गांव लौटते ,लगभग पूरे साल भर यही सिलसिला जारी रहता है।

सामाजिक कार्यकर्ता राजिन्दर चौधरी कहते हैं कि लॉकडाउन नट समुदाय की जिंदगी में एक अवसर और वरदान दोनों साथ लाया है। हो भी क्यों न, ग्रामवासियों के लिए पहली बार इतने लंबे समय तक गांव में एक साथ ठहरने का अवसर प्राप्त हुआ हैं। देश-दुनिया की खबरों में सोशल डिसटैंसिग के चलते हाथ मिलाने के स्थान पर हाथ जोड़ कर अभिवादन करने तथा दुनिया के अनेकों देशों में शवों को दफनाने के स्थान पर दाह संस्कार करने की भारतीय पंरपराओं के बारे में अरसे बाद चाहकर भी दाह संस्कार न कर पाने की टीस ने नट समुदाय को अंदर तक हिला दिया।

इस वेदना को उन्होंने गांववालों के समक्ष रखा तो इस मुद्दे पर सभी का साथ मिला, तय हुआ कि वह अपनी जड़ों को लौटेंगे, अब दफनाएंगे नहीं, दाह संस्कार की मूल परंपरा को अपनाएंगे। जागरूक ग्राम प्रधान सरोज देवी रंधावा ने नटों की वेदना को समझा और समझने के बाद सोशल डिस्टेसिंग का ख्याल रखते हुए लॉकडाउन के दौरान गांव में इस मुद्दे पर पंचायत बैठाई। नटों के इस मुद्दे पर नटों के अलावा जाट और विश्नोई समाज के लोग भी पंचायत का हिस्सा बने।

चौधरी ने बताया कि पंचायत में सभी की सहमति से तय हुआ कि अब नट समुदाय भी गांव के एकमात्र सामुदायिक श्मशान घाट पर शवों का दाह संस्कार करेंगे। इस तरह कोरोना और लॉकडाउन ने गांव के इतिहास में नया अध्याय दर्ज कर दिया। पंचायत के ऐतिहासिक फैसले से सलावा ही नहीं आसपास के गांव भी खुश हैं। इस तरह लाकडाउन के ठहराव ने दाह संस्कार का अधिकार देकर नट समुदाय को मुख्यधारा में लौटने का अवसर प्रदान किया है। किन्हीं परिस्थितिवश अपनी मूल परंपराओं से कटे समाज के लिए कोरोना संक्रमण का लाकडाउन वरदान साबित हुआ।