एक  कार्यालय में  बहुत चतुर होशियार और चालाक बाबू ट्रांसफर होकर आया  ,वैसे वह अपने कारनामों से कुख्यात रहा हैं । सब कर्मचारी अधिकारी के पास उस बाबू की समस्या लेकर आये  अधिकारी ने सबकी बात सुनी और पूछा अब रास्ता क्या हैं ? कुछ बोले हम अपना ट्रांसफर करा लेते हैं ,कुछ बोले उसका ट्रांसफर यहाँ नहीं होना चाहिए ,पर अधिकारी ने कहा बिना पूर्व धारणा के निर्णय नहीं लेना चाहिए । अधिकारी ने कहा की हमारे पास बहुत विकल्प हो सकते  हैं । हम कभी कभी दुष्टा  पत्नी का संग होने पर उससे अलग रह सकते हैं या तलाक दे सकते हैं ,पर इसी स्वाभाव के यदि हमारे माँ बाप भाई बहिन हो तो  क्या उनसे आप छुटकारा पाने क्या करेंगे ? क्या उनसे तलाक ले सकते हैं नहीं इसका मतलब हमें विषम परिस्थितियों में समता भाव से सामना  करना चाहिए ,एक बात हमें कर्मसिद्धांत से समझना चाहिए की जो हो रहा हैं वह होता हैं , होगा उसे हमें साक्षात भाव से द्रष्टा भाव से स्वीकार करना चाहिए ,क्या आप होने वाली घटना को रोक  सकते हैं ।
कोरोना अमेरिका
आज बाबा रामदेव का कहना हैं की से हमें राजनैतिक और आर्थिक बहिष्कार करना चाहिए । हम भी चाहते हैं पर करेंगे कैसे ? आज विश्व स्तर पर चीन का व्यापार फैला हुआ हैं ,उसने हमारी कमजोरी का फायदा उठाकर अपना व्यापार फैलाया .आज वह बहुत सीमा तक विश्व में केंद्रीकृत हो चूका .हर देश चीन के ऊपर आश्रित हो चूका हैं ,कोई भी क्षेत्र  हो .विशेष रूप से खाद्य ,रसायन ,औषधि ,टेक्निकल ,मेकेनिकल आदि आदि  । जब उसकी जेड इतनी अधिक विश्व में घर कर गयी हैं तब उससे निजात पाना सरल नहीं होगा ।
   यह  बात वर्ष 1962 से चल रही हैं और जितना बहिष्कार उतना अधिक उसका उससे सहयोग मिल रहा हैं । आज भारत के सम्बन्ध चीन से अलग प्रकार के हैं ,इतनी प्रतिकूल स्थितिओं निर्मित करने के बाद भी हमें उससे सम्बन्ध बनाने के लिए मजबूर हैं क्यों /वर्तमान  में हमारे मोदी जी ने कई बार चीनी नेताओं का अभूतपूर्व स्वागत किया आखिर क्यों ?हमने जापान ,रूस ,अमेरिका ,ब्रिटैन ,फ्रांस ,जर्मनी के साथ अन्य मध्य एशिया के मुस्लिम देशों से दोस्ती कर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई पर हम चीन से अपने दुरी क्यों नहीं बना पा रहे हैं ?कारण साफ़ हैं की हम चीन के साथ इतने अधिक घुल मिल गए हैं की हम तलाक लेने की स्थिति में नहीं हैं .आज हम विचार करे की हम कितने अधिक किन किन देशों के ऊपर आश्रित हैं ,तब समझ में आएगा की हमारा व्यापारिक सम्बन्ध चीन से अधिकतम हैं और अनेको सामग्रियों में हम उस पर आश्रित हैं ।
   यह बात विगत 6 वर्षों से कई बार सामने आयी की चीन हमारी सीमाओं को अतिक्रमित कर रहा हैं ,घुंसपैठ कर रहा हैं उसके बाद भी हमारी क्या मज़बूरी हैं की उससे सम्बन्ध नहीं तोड़ पा रहे हैं .हमें मालूम हैं की वह पाकिस्तान का समर्थक हैं और उसे मदद देता हैं ,संयुक्त राष्ट्र में उसको बचाता हैं पर हम लाचार हैं ।
   जो भी इसकी खिलाफत करना चाहते हैं उन्हें सुझाव ,किस प्रकार उससे सम्बन्ध विच्छेद करे खुल कर बताएं  अंतर्राष्ट्र्रीय स्तर पर हम सब देश आपस में गुथमगुथा हैं ।और सबको एक दूसरे से सहयोग अपेक्षित हैं .कोई भी राष्ट्र पूर्ण रूप से स्वाबलबी नहीं हो सकता हैं .हां हम कुछ वर्षों में परालम्बी न हो यह प्रयन्त करना होगा .हमारा देश विपुल संस्थानों से बहुसंख्यक आबादी वाला देश हैं। कुछ वस्तुए हमारे देश में हैं तो कुछ अन्य देशों में .व्यापारिक गतिविधियों से आर्थिक वृद्धि होती हैं  ।आज क्यों विश्व के सभी  देश भारत की ओर व्यापार के लिए क्यों देखते हैं ,कारण बहुल आबादी के कारण व्यापार की बहुत संभावनाएं हैं और रही हैं .यह चलन सनातन हैं ।

  इस समय कोरोना संक्रमण के कारण समस्त प्रतिबन्ध लगने से हमारे पास धन होने के बाद सामग्री नहीं हैं तो उस धन की क्या उपयोगिता ?कारण एक दूसरे के सब पूरक हैं और उपादेय हैं ।

 परस्परोग्रहो जीवानाम.इसका आशय एक जीव दूसरे जीव का उपकारी हैं .एक दूसरे की सहायता जीव द्रव्य की प्रकृति महान ।

 इसीलिए यह सब भाव प्रतिकूल अवस्था में आते हैं अन्यथा अन्य देश हमारे लिए उपकारी होते हैं और हम अन्यों के लिए .क्या अभी हमने पाकिस्तान से व्यापारिक ,सांस्कृतिक खेल आदि सम्बन्ध समाप्त कर लिए हैं या पूर्ण रूप से कर सकते हैं ।

 हाँ हमें अब विकेन्द्रीकृत नीतियां अपनानी होगी और धीरे धीरे पराधीनता से स्वाधीनता की ओर आना होगा ।

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